पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वैधानिक निकाय
(भारत सरकार)
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 2 (39) के अनुसार, “चिड़ियाघर” का मतलब एक प्रतिष्ठान है, चाहे स्थिर या अस्थिर/ गतिशील, जहां इन कैप्टिव जानवरों को जनता के प्रदर्शनी के लिए रखा जाता है और इसमें सर्कस और बचाव केंद्र शामिल होते हैं, लेकिन इसमें कैप्टिव जानवरों में लाइसेंस प्राप्त डीलर के स्थापना शामिल नहीं होती है ।
हम में से अधिकांश लोगों ने कभी न कभी, आमतौर पर अपने बचपन के दौरान - माता-पिता के साथ या अपने स्कूल द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में चिड़ियाघर का दौरा करा होगा । बहुत से लोग चिड़ियाघर को एक विश्राम, मनोरंजन एवं मस्ती करने का स्थान समझते हैं । यद्यपि चिड़ियाघर का प्रारंभिक उद्देश्य मनोरंजन ही था लेकिन कुछ दशकों से चिड़ियाघर, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण शिक्षा केंद्रों में परिवर्तित हो गए हैं ।चिड़ियाघर मज़बूत प्रतिक्रियाओं को उजागर करते हैं । चिड़ियाघर में लोग उन जानवरों को देखने का अवसर पाते हैं जिन्हें उन्हें कभी भी देखने का मौका नहीं मिल सकता । चिड़ियाघरों से शहरी लोगों को वन्यजीव के निकट/ संपर्क में आने का मौका मिल पाता है, और इस प्रकार चिड़ियाघर लोगों में जानवरों के प्रति रुचि और प्यार बनाने का एक अनूठा अवसर प्रदान करते हैं ।जहां कुछ लोग चिड़ियाघर का आनंद लेते हैं, वहीं कुछ लोगों का यह मानना है कि जानवरों को कैद में रखना गलत है । जिस तरह यह सच है कि कई जानवर चिड़ियाघर में खुशी से नहीं रह पाते, वहीं दूसरी तरफ हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए, कि इनमें से कई जानवर बिना चिड़ियाघरो के बच भी नहीं पाएंगें । जानवरों को बचाने के अलावा, प्रजातियों के संरक्षण में भी चिड़ियाघर अहम भूमिका निभाते हैं । देशभर के कई चिड़ियाघर जंगलों से बचाए गए बीमार, घायल, कमजोर/ दुर्बल वन्यजीवों की देखभाल करते हैं । ऐसे जानवरों के लिए चिड़ियाघर द्वारा विशेष सुविधाओं का निर्माण किया जाता है । उन्हें प्रदर्शिनी के लिए नहीं रखा जाता है तथा उनकी देख रेख की जाती है ।विभिन्न जानवरों को आमने-सामने देखने, सुनने या जानने के अनुभव के लिए हमें किसी किताबी ज्ञान की आवश्यकता नहीं है । चलते-फिरते जानवर मन में जिज्ञासा और रुचि पैदा करते हैं । चिड़ियाघर हमें एक नई दुनिया दिखाने का अवसर प्रदान करते हैं, और इसका उपयोग आगंतुकों को वन्यजीव संरक्षण का महत्व एवं आवश्यकता के बारे में संवेदनशील बनाने में किया जा सकता है । चिड़ियाघर लुप्तप्राय जानवरों की योजनाबद्ध संरक्षण प्रजनन का कार्य जंगलों में उनकी दोबारा वापसी या वन्यजीव आबादी की पूर्ति के लिए कर रहे हैं । चिड़ियाघर वन्यजीवों के व्यवहार, जीवविज्ञान और पशु चिकित्सा पहलुओं का अध्ययन करने के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान हैं ।
अतीत में, भारत में चिड़ियाघरों की विस्फोटक वृद्धि हो गयी थी । यदि चिड़ियाघर सही तरीके से प्रबंधित किए जाएँ, तो वे वन्यजीवों के संरक्षण में सार्थक भूमिका निभा सकते हैं । केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की स्थापना देश में चिड़ियाघरों के कामकाज और विकास की देखरेख के लिए की गई थी । वन्यजीवों के कल्याण हेतु केवल उन्हीं चिड़ियाघरों को संचालन की अनुमति दी जाती है जो कि केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा मान्यता प्राप्त है तथा केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा निर्धारित मानकों और मानदंडों के अनुसार जानवरों को रखते हैं ।
कोलकाता शहर, पश्चिम बंगाल में मार्बल पैलेस ज़ू, जो कि वर्ष 1854 में स्थापित किया गया था, देश का सबसे पुराना मौजूदा चिड़ियाघर है ।
क्षेत्रफल के आधार पर, श्री वेंकटेश्वर जूलॉजिकल पार्क, तिरुपति, आंध्र प्रदेश, देश का सबसे बड़ा चिड़ियाघर है । जिसका क्षेत्रफल 1400 हेक्टेयर है ।
देश में 18/10/2024 तक) कुल 156 मान्यता प्राप्त चिड़ियाघर हैं, जिनमें से 17 बड़ी श्रेणी, 23 मध्यम श्रेणी, 34 छोटी श्रेणी और 63 लघु श्रेणी के चिड़ियाघर हैं, जिसमें 19 बचाव केंद् भी शामिल हैं । चिड़ियाघर के संचालन के लिए तकनीकी और वैज्ञानिक मानव संसाधन, रखरखाव, आवास, स्वास्थ्य देखभाल और आगंतुक सुविधाओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए चिड़ियाघरों को वर्गीकृत किया गया है। चिड़ियाघरों का वर्गीकरण उनके क्षेत्र के आधार पर, आगंतुकों की संख्या, प्रजातियों की संख्या और उपलब्ध जानवरों - लुप्तप्राय प्रजातियों सहित - आधार पर किया जाता है ।
The ownership pattern of recognised zoos is as follows:
क्रमांक
स्वामित्व
चिड़ियाघरों की संख्या
1
भारत सरकार (पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय)
2
भारत सरकार (स्वायत्त निकाय)
3
राज्य सरकार (वन विभाग)
120
4
राज्य सरकार (वन विभाग के अलावा)
5
नगर निगम
10
6
सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम
7
गैरसरकारी संगठन / ट्रस्ट / सोसाइटी
14
8
निजी
कुल
156
(18/10/2024 तक)
भारतीय चिड़ियाघरों द्वारा प्रदर्शित प्रजातियों और जानवरों की संख्या निम्नानुसार है:
# प्रजाति
# पशु
संकटग्रस्त प्रजाति
(अनुसूची I और II)
(25 %)
स्तनधारी
79
8,799
पक्षी
36
2,425
सरीसृप
31
6,786
जलस्थलचर
29
144
18.041
अन्य भारतीय प्रजाति
(अनुसूची III और IV)
(43 %)
19
15,752
148
9,038
55
2,784
21
244
27,696
विदेशी प्रजाति
(32 %)
37
387
113
10,779
23
418
179
कुल योग
567
57,220
(31 अक्तूबर, 2018 तक)प्रत्येक मान्यता प्राप्त चिड़ियाघर से संबंधित जानकारी इस वेबसाइट " चिड़ियाघरो के बारे में जानकारी" पर "सार्वजनिक सूचना" शीर्षक के तहत है ।
भारतीय चिड़ियाघरो में 31 मार्च, 2018 तक के आंकड़ों के अनुसार 150 लुप्तप्राय प्रजातियां हैं ।
के.चि.प्रा. का प्रतीक चिन्ह परस्पर/ आपस में बंधे हाथों की एक जोड़ी है, जो सहयोग और आपसी निर्भरता का संकेत है । काला हाथ स्तनधारियों की तरह दिखता है जबकि सफेद हाथ एक पक्षी की तरह दिखता है । संलग्न ‘सी’ केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के पहले अक्षर को दर्शाता है और साथ ही साथ "संरक्षण" - के.चि.प्रा. का संकल्प – वन्यजीवों का सरंक्षण को भी इंगित करता है । प्रतीक चिन्ह का खुला आकार - पिंजरे जैसे परंपरागत बाड़ों से दूर रहने का सूचक है
चिड़ियाघर में जानवर निम्न प्रकार द्वारा आते हैं : 1. कैप्टिव प्रजनन कार्यक्रम और विनिमय कार्यक्रम- चिड़ियाघर में आने वाले लगभग सभी नए जानवर कैप्टिव प्रजनन कार्यक्रमों के माध्यम से दूसरे चिड़ियाघरों में लाए जाते हैं । चिड़ियाघर दूसरे चिड़ियाघरों के साथ अपने अधिशेष जानवरों अदला-बदली भी करते हैं । इसके लिए संबंधित प्राधिकारी की अनुमति और मंजूरी लेना आवश्यक है ।2. बचाए गए जानवर- जंगल से जानवरों को केवल बचाने के उद्देश्य से या योजनाबद्ध प्रजनन कार्यक्रमों के लिए अधिग्रहित किया जाता है । वन्यजीव आज गड़बड़ी और आवास/ निवास के नुकसान के परिणामस्वरूप मनुष्यों के परस्पर विरोध/ संपर्क में आ रहे हैं । ऐसे पीड़ित जानवरों को बचाकर चिड़ियाघरों में लाया जाता है । कुछ जानवर, जैसे कि – पालतू हाथी और बंदर, जब अपने स्वामी के नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं/ या अपना आपा खो देते हैं, तो विनाशकारी हो जाते हैं । इन जानवरों द्वारा लोगों और संपत्ति को नुकसान पहुंच सकता है । इस स्थिति में चिड़ियाघरों को मदद के लिए बुलाया जाता है । इन पकड़े गए जानवरों को उपचार और रख-रखाव के लिए चिड़ियाघर में लाया जाता है ।
चिड़ियाघर में मौज-मस्ती के साथ-साथ बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है । लोगों को खुद से यह एहसास होना चाहिए कि चिड़ियाघर में पाए जाने वाले जानवर विशेष हैं । दरअसल, चिड़ियाघर में पाई जाने वाली कई प्रजातियों विलुप्त हो रही हैं । जंगल में इनकी आबादी कम होने के कई कारण हैं ।आम तौर पर, लोग हरेक पशु बाड़े में कुछ ही समय के लिए रुकते हैं और अगले बाड़े को देखने के लिए जल्द ही आगे बढ़ जाते हैं । यदि थोड़ा समय रुककर बिताएँ, तो बहुत सी बातों पर गौर किया जा सकता है । जानवरों को देखने-समझने के अलावा, जानवरों के भोजन, व्यवहार इत्यादि के बारे में चिड़ियाघर कीपर से बात करना एवं दिलचस्पी लेना एक अच्छा अनुभव हो सकता है ।चिड़ियाघर में आगंतुकों द्वारा अनेक गतिविधियां की जा सकती हैं, जो कि वे निम्नानुसार हैं : शिक्षा / व्याख्यान सुविधाओं का दौरा करना - जानवरों के बारे में पूछताछ, चिड़ियाघरों द्वारा आयोजित विभिन्न वार्षिक कार्यक्रमों में भाग लेना ।पक्षियों के बाड़े/ प्रदर्शनी का दौरा करना- पक्षियों को देखने के लिए टावरों का इस्तेमाल करना, आवासी और प्रवासी पक्षियों, जल पक्षियों आदि के बारे में जानकारी एकत्रित करना ।सरीसृप गृह का दौरा करना: चिड़ियाघर में स्थित विभिन्न सरीसृपों को देखना और ध्यान में रखना ।
चिड़ियाघर जानवरों के लिए एक खास जगह हैं, इसलिए इस बात की जानकारी अवश्य होनी चाहिए कि चिड़ियाघर में क्या-क्या नहीं करना चाहिए । कभी-कभी आगंतुक जानबूझकर या अनजाने में जानवरों को परेशान कर देते हैं । चिड़ियाघरो में अक्सर जगह-जगह पर साइनबोर्ड लगे होते हैं जो लोगों को उन बातों के बारे में बताते हैं जिन्हें नहीं किया जाना चाहिए। इन निर्देशों का गंभीरता से पालन किया जाना चाहिए । देश में कई चिड़ियाघरों को "नो प्लास्टिक ज़ोन" घोषित किया गया है । आगंतुकों को चिड़ियाघर में खाद्य सामग्री के साथ प्लास्टिक बैग नहीं ले जाना चाहिए । यह जानवरों की रक्षा के लिए किया गया है, यदि प्लास्टिक की थैली, खाली या खाने के साथ, जो जानवरों के बाड़े के अंदर या बाहर गिर जाए, तो उन्हें जानवरों द्वारा निगला जा सकता है । प्लास्टिक के थैली गैर-बायोडिग्रेडेबल होते हैं और उन्हें पचाया नहीं जा सकता है । वे पाचन तंत्र को कमज़ोर कर देते हैं, और यहाँ तक की जानवरों के मृत्यु का कारण तक भी बन सकते हैं ।दो बहुत ही महत्वपूर्ण बातें हैं जो चिड़ियाघर के आगंतुकों को हमेशा याद रखनी चाहिएँ ।1. जानवरों को कुछ ना खिलाएँ यह चिड़ियाघर का सबसे पहला नियम है । हरेक जानवर को एक अलग/ विशेष प्रकार के भोजन की आवश्यकता होती है। चिड़ियाघर में जानवरों को दिया जाने वाला भोजन उस तरह का होता है जैसा कि वे जंगल में खाते है । यदि उन्हें आगंतुकों द्वारा बिस्कुट, वेफर्स इत्यादि खिलाया जाए, तो जानवर अपने विशेष प्रकार के खाने वाले भोजन की इच्छा खो देते हैं । यहाँ तक कि आगंतुकों द्वारा दिये जाने वाले भोजन की वजह से जानवर मानव रोगों से भी संक्रमित होकर बीमार पड़ जाते हैं और कई बार तो उनकी मृत्यु तक हो जाती है । कई लोग समझते हैं कि वे जानवरों को खाना खिलाकर उनकी मदद कर रहे हैं । जबकि बेहतर होगा जानवरों को खाना खिलाने के बजाए उनके रखवालों/ अभिरक्षकों द्वारा खाना खिलाए जाने तक का इंतजार करना और उनको खाते देखना ।2. जानवरों को परेशान नहीं करना चिल्लाना, ताली बजाना, चेहरे बनाना, चीज़ों को फेंकना, पिंजरे के सामने दौड़ना, छड़ें लहराना - ऐसी गतिविधियां जानवरों को परेशान करती हैं । शांत वातावरण जानवरों को लुभाता है और यदि लगातार मौन बनाए तो जानवरों को भी सुना जा सकता है ।पशु बहुत शर्मीले और संवेदनशील होते हैं और उनकी अपनी दिनचर्या होती है। कुछ जानवर जहां रात में जागते हैं वहीं वे ज़्यादातर दिन में सोते हैं, और कुछ आगंतुक जानवरों घूमते देखने की चाह में जानवरों को परेशान करते हैं, इससे उनकी दिनचर्या बिगड़ जाती है । कुछ जानवर एकांत पसंद करते हैं, इसी वजह से वे छिपे रहते हैं । यदि कोई जानवर किसी समय नहीं दिख पा रहा है, तो उसे बाद में वापिस आकार देखने की कोशिश की जा सकती है । अक्सर लोग जानवरों से हर समय सक्रिय होने की उम्मीद करते हैं, और उनके द्वारा देखे जाने या इशारे करे जाने पर उनकी प्रतिक्रिया चाहते हैं । चिढ़ाना चिड़ियाघर जानवरों के लिए पीड़ा का एक प्रमुख कारण है । चिढ़ाना मानसिक तनाव का कारण बनता है । कई बार आगंतुकों को चिढ़ाना "हानिरहित" प्रतीत होता है, जैसे कि जानवरों को देखकर उंगलियों से इशारे करना, आवाज़ लगाना उसका पीछा करना, या पिंजरे के सामने दौड़ना इत्यादि जानवरों को परेशान कर सकता है।आगंतुकों के अनेक बर्ताव जैसे कि थूकना एवं धूम्रपान, जानवरों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं । वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 38 जे के अंतर्गत चिड़ियाघर के जानवरों को खिलाना, चिढ़ाना एवं चिड़ियाघर के अंदर कूड़ा-कर्कट फेंकना एक दंडनीय अपराध है ।
देश में कई चिड़ियाघरों ने चिड़ियाघर के जानवरों को प्रायोजित करने या अपनाने की पहल शुरू की है जिसके अंतर्गत एक प्रायोजक चिड़ियाघर में रखे जानवरों की देखभाल के लिए धन / दान प्रदान कर सकता है । चिड़ियाघर अधिकारी प्रायोजक द्वारा दिए गए दान की सहायता से प्रायोजित पशु का ख्याल रखते हैं । यह उन जानवरों की देखभाल करने का एक विशेष तरीका है जिन्हें आप पसंद करते हैं ।
कई चिड़ियाघर विशेष व्यक्तियों (दिव्यंग्जन) के लिए उचित और सुविधाजनक स्थानों पर पर्याप्त नागरिक सुविधाएं प्रदान करते हैं । चिड़ियाघर ऐसे व्यक्तियों के लिए जानवरों को देखने के लिए पशु बाड़ों पर व्हीलचेयर और स्लैंटिंग रैंप इत्यादि की व्यवस्था भी करते हैं ।चिड़ियाघरों में जानवरों की सुरक्षा के लिए में निम्नलिखित वस्तुओं की अनुमति नहीं है: किसी भी प्रकार की प्लास्टिक की चीज़ें – बोतेलें, प्लास्टिक की थैलियाँ, एल्यूमीनियम के डिब्बे, प्लास्टिक के ढक्कन या स्ट्रॉ इत्यादि । क्योंकि यह गलती से जानवरों के बाड़ों के अंदर तक भी पहुँच सकते हैं ।
चिड़ियाघरों में पालतू जानवरों को ले जाने की अनुमति नहीं है – क्योंकि इससे चिड़ियाघर को जानवरों के संक्रमित होने का भय बना रहता है, जिसका कि जानवरों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है ।
लोग / आगंतुक / छात्र एक स्वयंसेवक के रूप में चिड़ियाघर की मदद कर सकते हैं । कई चिड़ियाघरों ने चिड़ियाघर संबंधी स्वयंसेवी कार्यक्रम शुरू किए हैं जहां एक स्वयंसेवक आगंतुक स्वागत प्रबंधन, चिड़ियाघर शिक्षा कार्यक्रम इत्यादि जैसे दैनिक प्रबंधन में सहायता कर सकते हैं । केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने भारत में चिड़ियाघर प्रबंधन में स्वयंसेवकों के लिए दिशानिर्देश जारी की है । इच्छुक व्यक्ति इन गतिविधियों में भाग लेने के उद्देश्य से चिड़ियाघर के अधिकारी-प्रभारी से संपर्क कर सकता है ।
चिड़ियाघर में जानवरों के व्यवहार और जरूरतों के अनुसार, प्राकृतिक तरीके से (जिस तरह वे जंगल में रहते हैं), बाड़ों का निर्माण किया जाता है । मस्त रहना एवं विश्राम करना जानवरों का एक प्राकृतिक व्यवहार है । आगंतुकों की उपस्थिति या व्यवहार के कारण वे उत्साहित या तनावग्रस्त हो सकते हैं और उस स्थिति में, वे अपने बाड़े में किसी भी आरामदायक जगह चले जाते हैं । कभी-कभी जानवर किसी ऐसे स्थान पर विश्राम कर रहे होते हैं जहां से वे आगंतुकों को आसानी से दिखाई नहीं दे पाते । ऐसा होने का मुख्य कारण, विभिन्न जानवरों का दिन के अलग-अलग समय में सक्रिय होना है । आगंतुकों का जानवरों को देखने के लिए सहनशील होना बहुत आवश्यक है, जिससे कि वे तनाव मुक्त रहें ।